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जब आप यह पढ रहे होंगे तब तक शायद वे मर चुके होंगे

अद्रिजा बोस: मेघालय के कोयला खदान में मजदूरों के फंसने की सूचना मिलने के एक दिन बाद 60 साल के एक बुजुर्ग 400 किलोमीटर का सफर तय कर गारो हिल्स के राजाबाला पहुंचे. वह उस जगह पर धरने पर बैठ गए जहां कोयला खदान में घुसने से पहले उनके दो पोतों को आखिरी बार देखा गया था. इस दौरान वहां बचाव कार्य जारी है, एनडीआरएफ के 71 बचावकर्मी काम में जुटे हुए हैं और मीडिया भी पहुंच चुकी है. इस बीच वह बुजुर्ग किसी चमत्कार की उम्मीद में वहीं बैठे रहे.
कोयला खदान से कुछ मीटरों की दूरी पर ही उन मजदूरों की झोपड़ियां हैं, जो 14 दिन से खदान के अंदर फंसे हुए हैं. इन झोपड़ियों में अगर कुछ बचा है तो बस टूटे अंडों के कुछ छिलके, गंदी पुरानी चप्पलें, प्लास्टिक की खाली बोतलें और जमीन पर कोयले की मोटी परत. घटना के 13 दिन बाद वह बुजुर्ग इंतजार करते हुए थक गए और अपने गांव वापस लौट गए.
इस बीच, राज्य बचाव दल के कुछ कर्मी वहां बैठकर अगले निर्देश का इंतजार कर रहे हैं. अब एनडीआरएफ आ चुकी है तो उनका काम लगभग खत्म ही हो चुका है. वहीं NDRF की टीम इस इंतजार में है कि खदान से पानी निकालने के लिए सरकार पर्याप्त पंप्स का इंतजाम करे. सरकार इस इंतजार में है कि कोई पानी निकालने के लिए विशेष पाइप्स का इंतजाम करने में उनकी मदद करे.
हालांकि, खदान में फंसे मजदूरों के परिवारवालों का इंतजार खत्म नहीं हो रहा है. परिजन सिर्फ एक बार उनका चेहरा देख लेना चाहते हैं, फिर चाहे उनका मृत शरीर ही बाहर क्यों न निकले.
मगरमाराई गांव के 55 वर्षीय शोहोर अली का 18 साल का बेटा, 35 साल का भाई और 26 साल का दामाद, तीनों खदान में फंसे हुए हैं. वह कहते हैं, 'इस खदान के सरदार ने मेरे बेटे, भाई और दामाद को इस नौकरी का ऑफर दिया था. काम के बदले उन्हें हर दिन 1000 रुपये देने का वादा किया गया था. उन्हें फूटी कौड़ी नहीं मिली और न ही वे वापस आए.' अली को लगता है कि अब तीनों इस दुनिया में नहीं हैं. उनके सामने अब अपनी पत्नी, बेटी और उसकी तीन बेटियों के परवरिश की जिम्मेदारी है.
अली या उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने इससे पहले कोयला खदान में काम नहीं किया था. वह 200 रुपये के कमीशन पर लोगों को किराए का घर दिलवाने का काम करते हैं. अली ने कहा, "सरदार ने यह नहीं बताया था कि मेरा बेटा अब वापस नहीं लौटेगा." उन्हें बताया गया था कि हर हफ्ते के अंत में उन्हें पैसे दिए जाएंगे, लेकिन छठे दिन खदान में घुसने के बाद मजदूर वहीं फंस गए.
वह अभी तक मौके पर नहीं गए हैं. उन्होंने सवाल किया, 'मैं कैसे जाऊंगा? मेरे पास इतने पैसे ही नहीं हैं. वह बस किसी खबर के इंतजार में बैठे हैं. वह पूछते हैं, 'क्या मुझे एक बार भी उनका चेहरा देखना नसीब नहीं होगा?'

बैन जो कभी लागू नहीं हुआ
शिलॉन्ग से करीब 3 घंटे के सफर के बाद लुमथारी गांव पड़ता है, जहां कोयला खदान में 13 दिसंबर से मजदूर फंसे हुए हैं. 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मेघालय में रैट होल माइनिंग पर बैन लगाया था, जो कि महज एक दिखावा साबित हुआ, इसे कभी लागू नहीं किया गया.

एक स्थानीय रिपोर्टर ने मुझे सुझाव दिया, 'कोयला खदान से गुजरते हुए अपनी कार मत रोकियेगा, फोटो मत खींचियेगा.' एनजीटी के बैन के बाद शिलॉन्ग के ज्यादातर लोग जैंतिया हिल्स की तरफ नहीं जाने की सलाह देते हैं. वे इस इलाके को असुरक्षित बताते हैं, हर किसी को पता है कि वहां रैट होल खदानें मौजूद हैं, वहां अवैध रूप से खनन चलता है. मजदूरों की अक्सर वहां मौत हो जाती है, लेकिन इस बारे में किसी को पता नहीं चल पाता।

पिछले महीने, मेघालय में अवैध खनन में नेताओं की भूमिका के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता एग्नेस खारशिंग और उनकी सहयोगी अनिता संगमा पर हमला हुआ था. वे दोनों जैंतिया हिल जिले के एक इलाके में कोयला लेकर जा रही गाड़ियों की फोटो खींच रही थीं, इसी दौरान उन पर हमला हुआ. हमले से एक दिन पहले ही एग्नेस ने शिलॉन्ग पुलिस को अवैध रूप से ले जाए जा रहे कोयले के पांच ट्रकों के बारे में जानकारी दी थी. उन ट्रकों को जब्त कर लिया गया था.

इन कोयला खदानों के मालिक और डीलर तो स्थानीय हैं, लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर खदान के अंदर जाने वाले ज्यादातर मजदूर बाहरी हैं. आमतौर पर वे नेपाल, बांग्लादेश और असम से आते हैं. एग्नेस कहती हैं, 'लोगों को पता है कि ये खदानें कितनी असुरक्षित हैं. लेकिन बाहर से आए गरीब मजदूरों को इसकी जानकारी नहीं है. इसलिए कोल माफिया उनका फायद उठाते हैं. इन खदानों से वे मोटी कमाई करते हैं और शिलॉन्ग जैसी जगहों पर घर-जमीन खरीदते हैं.'

उस हमले के बाद से एग्नेस बिस्तर पर हैं और दिन में बमुश्किल 10 कदम चल पाती हैं. लेकिन उन्होंने अपनी जंग जारी रखी है. वह कहती हैं, 'मेरे पास ऐसे सबूत हैं जिन्हें सरकार भी नकार नहीं सकती है. अब तो यह साफ हो गया है कि सरकार की जानकारी में ही ये अवैध कोयला खदानें चल रही हैं.' एग्नेस पर हमले और खदान में हुए हादसे के बाद सरकार घिरी हुई नजर आ रही है.
पिछले महीने हुए हमले के बाद से बिस्तर पर हैं एग्नेस.
मेघालय पुलिस के अप्रैल 2014 से इस साल नवंबर तक के ऑनलाइन रिकॉर्ड्स के मुताबिक, एनजीटी के आदेश की अवमानना के कम से कम 477 मामले दर्ज किए गए. अवैध खनन, अवैध ट्रांसपोर्टेशन और तय सीमा से अधिक कोयले की ढुलाई के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया, कई ट्रकों को जब्त भी किया गया.

एग्नेस कहती हैं कि पुलिस और सरकार खदान मालिकों से मिली हुई हैं. इसी वजह से राज्य में अवैध खनन इतना अधिक है. उन्होंने कहा,"सरकार इन मजदूरों को खदान में जाने से रोक सकती थी. वे उस रैट होल से वापस ही नहीं आए. सरकार के पास केवल अमीरों के लिए नीतियां हैं, गरीबों के लिए नहीं. बड़ा रैकेट चल रहा है."
क्या काफी हैं कोशिशें?
घटना की सूचना मिलने के बाद से ही एनडीआरएफ के असिस्टेंट कमांडेंट एसके सिंह मौके पर मौजूद हैं. वह कहते हैं, 'हमने सब ट्राई कर लिया. सोनार रेडियो, डाइवर्स, नाव और वॉटर पंप. लेकिन अभी तक सिर्फ असफलता ही हाथ लगी है.'

सिंह ने कहा, 'हमें कोई मैप या ब्लूप्रिंट नहीं मिला क्योंकि ये खदानें अवैध रूप से चल रही हैं किसी को इस संबंध में जानकारी नहीं है कि अंदर क्या है.' हालांकि स्थानीय लोगों ने एनडीआरएफ को बताया कि खदान करीब 350 फीट गहरी है. उन्होंने कहा, 'अंदर करीब 70 फीट तक पानी भरा हुआ है.'

एनडीआरएफ के अधिकारी ने बताया, 'हमें पता चला है कि इलाके की ज्यादातर खदानें अंडर ग्राउंड लेवल पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि हो सकता है कि मजदूरों में से किसी एक ने गलती से गुफा की दीवार में छेद कर दी हो. जिसकी वजह से लाइटीन नदी का पानी वहां भर गया.' सिंह ने कहा, 'हमारी ट्रेनिंग 40 फीट की गहराई तक डाइव करने की है, लेकिन पानी का स्तर उससे कहीं अधिक है. हमने प्रशासन से कहा है कि पंप की मदद से पानी को बाहर निकालें ताकि हम अंदर जा सकें.'

माइनिंग एक्सपर्ट जसवंत सिंह गिल ने मौके पर पहुंचकर बचाव कार्य में तेजी लाने के लिए राज्य सरकार को कई सुझाव दिए. इनमें सबसे जरूरी सुझाव था पंप की मदद से पानी को बाहर निकालना. उन्होंने कहा कि इसके लिए 150 हॉर्सपावर के कम से कम 100 पंप्स की जरूरत होगी. इस वक्त साइट पर केवल 25 हॉर्सपॉवर के पंप मौजूद हैं. सिंह ने कहा, 'एनजीटी बैन के बाद सारी मशीनरी कबाड़ में चली गई. ज्यादातर पंपों में ज़ंग लग गई और अब वे काम नहीं कर रहे हैं.'
13 दिन इंतजार करने के बाद भी सिंह किसी हलचल की उम्मीद में हैं. वह कहते हैं, “बचावकर्मी उम्मीद नहीं छोड़ सकते हैं.” खदान में पानी का स्तर जस का तस बना हुआ है. मजदूरों का कोई निशान नजर नहीं आ रहा है. अभी तो यह भी साफ नहीं है कि कितने मजदूर फंसे हुए हैं, कुछ 15 कह रहे हैं तो कुछ 18.
मेघालय के एक गांव में अवैध खनन के खिलाफ प्रोटेस्ट करते ग्रामीण
एनजीटी के बैन से पहले करीब 8 साल तक कोयला खदान में काम कर चुके अली बताते हैं, “मैंने ऐसी परिस्थितियां पहले भी देखी हैं, मेरे सामने लोगों की मौत हुई है. मुझे पहले दिन से पता है कि पानी निकालने के लिए उन्हें कम से कम 100 पंपों की जरूरत होगी. मैंने एनडीआरएफ की टीम से भी कहा कि मैं मदद कर सकता हूं, लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी.”
अली ने कहा कि वह कई कोयला खदान मालिकों को जानते हैं जिनके पास सैकड़ों पंप हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि सरकार ने जानते-बूझते हुए इस बात पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि यहां अवैध खनन जारी है. उन्होंने कहा, "उन्हें लगता है कि हमारी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है."
अली ने कहा कि जब खनन लीगल था तब भी मजदूर घायल होते थे, मौतें तब भी होती थीं लेकिन तब वे पुलिस के पास शिकायत कर सकते थे. लेकिन अब उनके पास यह ऑप्शन भी नहीं है. बैन के बुरे प्रभाव पर बात करते हुए अली कहते हैं कि बैन से पहले किसी की मौत होने पर खदान मालिक और सरदार उसके परिवार 4-5 लाख रुपये का मुआवजा दे देते थे. वह कहते हैं, "अब गिरफ्तार होने के डर से वे सभी फरार हो गए हैं, हम किसी से मदद भी नहीं मांग सकते."
क्यों बेअसर रहा बैन?
मेघालय में कोयला खनन का मुद्दा राजीतिक है. इस साल फरवरी में विधानसभा चुनाव में यह देखा भी गया, विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव में कांग्रेस इसीलिए हारी क्योंकि उसने एनजीटी का बैन हटवाने के लिए कुछ नहीं किया. बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि 8 महीने के अंदर इस मुद्दे का समाधान निकालेंगे. हालांकि बैन अभी भी जारी है.
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कांग्रेस कहती है कि राज्य में बीजेपी की गठबंधन की सरकार बनने के बाद अवैध खनन में बढ़ोत्तरी हुई है.
वहीं ग्रांड काउंसिल ऑफ चीफ्स ऑफ मेघालय के चेयरमैन जॉन एफ खारसिंग का मानना है कि कोयला खनन पर पूरी तरह बैन लगाना असंभव है. खारसिंग जैंतिया हिल्स के ट्राइबल नेताओं के मुखिया हैं. वह कहते हैं, "यहां 12-13 तरीके की लैंड ओनरशिप है. देश के हर हिस्से में लीज़ एंड ऑक्शन सिस्टम चलता है सिवाए मेघालय के. यहां लोग जमीन पर अपना अधिकार समझते हैं और उसमें जो मौजूद है उसमें भी."
2017 में पीएम मोदी को लिखे एक पत्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने लिखा था कि मेघालय में कोल माइन्स नेशनालाइजेशन एक्ट, 1973 कभी भी लागू नहीं किया गया क्योंकि इससे स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों का हनन होगा. संगमा ने Mines & Minerals (Development and Regulation) Act, 1957, और the Coal Mines (Nationalisation) Act, 1973 को मेघालय से हटाने के लिए राष्ट्रपति की तरफ से नोटिफिकेशन जारी करने का अनुरोध किया था.
हालांकि जोवाई के पर्यावरण कार्यकर्ता एचएच मोहरमेन की राय है कि कोई व्यक्ति जमीन का मालिक है तो भी उसे वायु या जल प्रदूषण का अधिकार नहीं दिया जा सकता है और इसलिए NGT बैन लगाना जरूरी है.
जिन इलाकों में कोयला खनन होता है वहां खेती नहीं होती, न ही उन इलाकों में प्रयाप्त पानी है. इन इलाकों में पानी में इतना अधिक प्रदूषण है कि यहां नदियों का पानी भूरे-संतरे रंग का दिखता है. ज्यादातर लोगों को पीने के पानी के लिए घंटों पैदल चलकर जाना पड़ता है.
शिलॉन्ग स्थित नॉर्थ ईस्टर्न हिल्स यूनिवर्सिटी में पर्यावरणीय अध्ययन के प्रोफेसस सुमरलिन स्वेर और ओपी सिंह ने अपने रिसर्च पेपर में लिखा है कि कोयला खनन का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव जैंतिया हिल्स की नदियों पर पड़ा है...और पढ़ें>>>

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